शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

"ओ रब्बा....."

तू कहां वाकिफ है 
हकीकत हमारी से
तू क्या जाने 
कितना दो चार 
होते हैं दुनियां दारी से 

नमक तेल आटा 
तो कभी तरकारी नहीं 
कोई साधन सरकारी नहीं 
रोज लड़ते हैं लाचारी से 
ओ रव्वा .....
तू कहां वाकिफ है
हकीकत हमारी से
तू क्या जाने 
कितना दो चार 
होते हैं दुनियां दारी से 

दिन रात एक करते हैं 
हालात वहीं के वहीं 
सुन ली आंखें मूंद के
जिसने जो कही सही 
नादानों से खेलता आया
जमाना समझदारी से
ओ रब्बा ......
तू कहां वाकिफ है
हकीकत हमारी से
तू क्या जाने कितना
दो चार होते है दुनियादारी से
ओ रब्बा........

                                               अजनबी 

मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

"वो..... और तुम"

वो अड़ोस-पड़ोस आंगन
वो सलोटों का घर
वो हरे खेत खलिहान दरिया
वो तेरा होना मरहम

वो मचान मकई बरसातें
वो मुस्कान तेरी बातें
वो लटों का पानी सावन
वो गठरी घास राह में तेरे कदम

वो सर्दी दुपहरी
वो खुली तेरी जुल्फें
वो दरिया की हवा ठंडी
वो इंतज़ार करना तेरा**


                                                   अजनबी 

रविवार, 16 नवंबर 2025

"वक्त मुकर्रर है "


💔  “वक़्त मुक़र्रर है”


ठहर जा मेरे साथ ही,
ढलती शाम तक,
पाबंद है बड़ा,
वक़्त अपने वक़्त का।
जो  वक़्त आ गया,
तो कौन तेरे लिए बेकरार होगा।
             
         🌿🌸 🌿

थोड़ी देर ही सही,
अपनी सूरत 
मेरी आँखों के पास तो रख,
बंद हो जाएँगी ये आँखें,
तो फिर कहाँ दीदार होगा।
            
          🌿🌸🌿

एक वो है,
जो पास आती जा रही है,
और एक तू है,
जो दूर चली जाती है।
तेरे आने से पहले वो आ गई तो,
फिर कहाँ हमसे तेरा इंतज़ार होगा।
            
          🌿🌸🌿

चलो मैं ही ग़लत सही,
जो ऊँचे आसमाँ को चाहने लगा,
पर देखो, वक़्त भी मुक़र्रर है,
आएगा तो लेकर ही जाएगा,
फिर कहाँ इस जन्म में तुमसे प्यार होगा। 
           
           🌿🌸🌿
                                               
                                                अजनबी 


शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

"वाह रे करवा"

तन-मन की साधना से पहले,
धो दिए सब उसने,
मेरे भावों के छींटे —
जो उसकी रूह पर लगे थे।

अब वह निश्चल है,
जैसे आरती का ठहरा जल,
निर्मल है —
जैसे गंगा में विलीन हो गया हो सब कुछ।

अब उसकी स्मृति-पटल पर
नहीं कोई मेरा ख्याल,
बुद्धमयी शांति ठहरी है वहाँ —
जहाँ मेरे भाव विचरते थे।

वाह रे करवा,
विरही को त्याग,
शांत बुद्ध में विलीन हो गया रे तू।

अब प्रेम नहीं,
समाधि बन गया —
मन झर गया,
बस शून्य रह गया रे मैं।

                                    
                                             अजनबी 

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रविवार, 5 अक्टूबर 2025

कितना खूबसूरत चांद

कौन से आसमां से उतर आया,
या मेरी चाहत से खिंचा आया।

धुंधले उजाले में टकटकी लगाए,
देखता मुझे, मैं उसे...
चुप्पियों में गुफ़्तगू सा साया।

देखो तो कितना ख़ूबसूरत चांद
अटका है मेरी दीवार पर,
झूम उठता है यह दिल
उसमें देख तेरी छाया। 

                                         अजनबी 

सोमवार, 1 सितंबर 2025

हे गिरधर.....

हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा।

पर्वत बन गए गारा,
धँस रही गीली धरा,
क्या करे हिमालय बेचारा।
हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा।


दुनिया डोले संकट भारी,
नदियाँ उफनें, डूबी धरती सारी,
मेघों ने फैलाया अंधियारा।
हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा।

भटके मन को राह दिखा दे,
डूबती नैया पार लगा दे,
तेरा ही है नाम सहारा।
हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा। 


                                          अजनबी 



शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

"सहूलियत"

कुछ तो सहूलियत
दी है सरकार ने,
चौबीसों घंटे
मिलते हैं दरबार में।

एक हल्का-सा स्पर्श,
और रूबरू हो जाते हैं,
शुक्र है, ब्रह्म मुहूर्त में
हम उन्हें देख पाते हैं। 

                     अजनबी 

रविवार, 17 अगस्त 2025

तुझे ही देखता हूं

कल से कुछ नहीं देखता हूं, सिर्फ़ तुझे देखता हूं
तेरी आँख में जैसे अपना जहाँ देखता हूं


तेरी ख़ामुशी दिल में गूँज उठे सदा बनकर
उस सदा में मैं कोई कारवाँ देखता हूं


चाँदनी में तेरा ही चेहरा झलक उठे अक्सर
रात की गोद में तेरा आसमां देखता हूं


तेरी सूरत के साए हर मोड़ पे मिल ही जाते
उन सायों में तेरा इक निशां देखता हूं


लोग कहते हैं अजनबी इश्क़ में हुआ है अंधा
हाँ मैं अंधा बस तुझे ही देखता हूं 


                                              अजनबी 

सोमवार, 11 अगस्त 2025

"मैं इक खुफिया कलाकार "

दिल के मौसम लिखता रहा,
पर किसी ने न जाना, मेरा संसार।
जिसे पहचान ना पाए यार 
ओ.....मैं इक खुफिया कलाकार


भीड़ में तन्हा, मैं चलता रहा,
लफ़्ज़ों में अपना दिल रखता रहा,
ज़माने को बस शोर था प्यारा,
मैं चुपचाप अपना गीत गाता रहा। 
सुर्खियों में नहीं निकला मैं गीतकार 
जिसमें जज्बात बेशुमार 
ओ.... मैं इक खुफिया कलाकार

मेरी ग़ज़लों में हैं रंग हज़ार,
मेरी कविताएं उसके दिल के द्वार,
पर सबको थी बस जल्दी की हवा,
किसे फुर्सत थी बैठ कर सुने ज़रा। 
अजीज महफिलों से रहा दरकिनार 
जिसके दिल द्वार लफ्ज़ बेशुमार 
...... मैं खुफिया कलाकार 

लोगों की नज़रें, आगे-आगे,
दिल की किताबें, पीछे रह जाएँ,
मैंने जो कहा, वो सुन न सके,
जो महसूस हुआ, वो समझ न सके।
ये जितने बेपरवाह मैं उतना वफ़ादार 
जज्बों का सौदागर ख्वाबों का सरदार 
ओ...... मैं इक खुफिया कलाकार

एक दिन शायद, हवा बदलेगी,
किसी की नज़र मेरी कलम पढ़ लेगी,
फिर मेरा नाम, आसमान छू लेगा,
और मेरा गीत, सबके दिल में गूंजेगा 

रातों में लिखूँ, सुबहों में गाऊँ,
अपनी रूह का राज़, शब्दों में समाऊँ। 
दिल मैं संभाले जज्बात हजार 
तब तक मैं .....खुफिया कलाकार 

                                     अजनबी 


मंगलवार, 29 जुलाई 2025

इश्क ए शराब


सन्नाटा था दिल में गहरा
उसकी आहट ने जैसे छू लिया सवेरा 


उसकी आहट से मेरी 
तो दुनियां निखर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई  

इश्क ए शराब के आगे 
नशा ए शराब कुछ नहीं 
एक उतरा एक चढ़ गया 
इसमें मेरा लगा कुछ नहीं 
मुस्कान जैसे बिजुरिया 
घटाएं चांद पर आकर बिखर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई  

रोशन हुए मेरे 
दरों-दीवार उसके आने से  
फिर बेकरार हुआ 
ये दिल उसके जाने से 
अंधेरे में जुगनू की महफिलें 
पल भर में न जाने किधर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई  


दिल की तासीर को 
आखिर महकदा याद आया  
मैंने देखा, उसने देखा मुझे, 
हाले दिल सारा साकी को सुनाया 
जाते-जाते उसकी 
खामोशी में इक बात रह गई
उसकी आहट से मेरी 
तो दुनियां निखर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई 

                               अजनबी 

रविवार, 27 जुलाई 2025

"अरमान बहीं"

चलते रहे हम वक़्त की राहों में
तेरे मेरे हिस्से थे कुछ गवाहों में
तू हँसा कहीं, मैं रोया कहीं
फिर भी दिल कहता रहा तू यहीं
शरीर बूढ़े होते हैं, चाहत नहीं
हम भी वहीं, तुम भी वहीं
वक्त बदल गया
मगर अरमान बहीं…"

तस्वीरों में अब भी वही रंग हैं
साँसों में तेरे नाम के संग हैं
तू जो नज़रों से ओझल सही
पर दिल के आईने में तू ही तू रही
"शरीर बूढ़े होते हैं, चाहत नहीं
हम भी वहीं, तुम भी वहीं
वक्त बदल गया
मगर अरमान बहीं…"

कभी चिट्ठियों में, कभी ख़्वाबों में
तेरे बिना अधूरे हर जवाबों में
आज भी धड़कन कहती यही
"वो मोहब्बत अब भी है सही…"
"शरीर बूढ़े होते हैं, चाहत नहीं
हम भी वहीं, तुम भी वहीं
वक्त बदल गया
मगर अरमान बहीं… 

                                                   अजनबी 



शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

" रंग भर रहा हूं "

रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं 

फीके पड़ गये जो लफ्ज़ 
तेरे मेरे नाम दर्ज 
उनमें उमंग भर रहा हूं 
हुई न कभी जो बातचीत 
तेरे मेरे बीच 
कुछ अनकहे प्रसंग भर रहा हूं 
रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं   

जमीन से बंधी डोर है 
हुनर वाज परिंदे चारों ओर है 
आसमान पाने की चाह में 
इन हवाओं से जंग लड़ रहा हूं
ख्वाबों के आसमान में
तेरी तलाश में 
कच्ची डोर से बंधा
मैं पतंग बन रहा हूं 
रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं 

दूरियों के जो दरमियां 
तेरी मेरी हैं खामोशियां 
उनमें मीठी तरंग भर रहा हूं 
रह गई तेरी बाहों की 
गुल्फों से जो कुछ नज़ाकतें 
रह गई तेरी जुल्फों से 
जो कुछ शरारतें 
उस मस्ती में भंग भर रहा हूं
रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं 

                                           अजनबी 

मंगलवार, 15 जुलाई 2025

"वे सजणा "

भरे विराने च तू  मुस्काया,  
किसी डर ने तैनू सहमाया।  
तेरे कोल कोल रहणे नूं 
जी करदा वे सजणा 
हर बरी तू लुकदा छुपदा 
काह्नों तड़फादां 
काह्नों सतांदा वे सजणा 
असां तेरी बेरुखी नाल मर जाणा
मेरी दिल बगिया दा तू सोणा फुल वे सजणा 
तू सोणा फुल वे सजणा 
आजा मेरे कोल हाकिमा 
एह वेला फिर नी मिलणा
एह वेला फिर नी मिलणा

तू बदलां दा उजाला नीर 
असीं चिकड़गारा वे सजणा, 
तेरे पावन ओज नाल 
बस मुक जाणा वे सजणा 
बण के धूल तेरी राह विच 
बिछाणा,  
दिल, जिंद, जान सब हार जाणा।  
तेतों नी जितणा वे सजणा, 
तेतों नी जितणा वे सजणा,   
सोणी सोणी मुस्कान नाल 
निहाल कर आसिमा
एह फुल फिर नी खिलणा
एह फुल फिर नी खिलणा

मेरे ख्वाबां दी तू रौनक 
असां तेरी बेरुखियां दे सोगी वे सजणा 
मेरे ख्वाबां दी तू रौनक
असां तेरी बेरुखियां दे सोगी वे सजणा 
मुल्कां मुल्कां दी तू बंजारन 
असां पहाड़ां दे जोगी वे सजणा 
मुल्कां मुल्कां दी तू बंजारन 
असां पहाड़ां दे जोगी वे सजणा 
तेरी बिरह दे धूणे बिच जल के 
तेरे नाम दा अलख जगाणा वे सजणा 
चाहे तूं मुड़ ना देख जालिमा 
असां सो बार मर के भी 
तेनु ही चाहणा वे सजणा 
चाहे तूं मुड़ ना देख जालिमा 
असां सो बार मर के भी
तेनु ही चाहणा वे सजणा 
तेनु ही चाहणा वे सजणा 

                                           





गुरुवार, 19 जून 2025

"मेरी अधूरी रचना"

**सुर्ख लिवास में वो सांवली सी,  
कंटिली झाड़ियों में 
खिला जंगली फूल जैसे लेंटाना।  
ओस भरी आंखों वाली 
वो मटमैली सी नायिका
मेरी अधूरी रचना।

*उसकी सादगी के गांव में,  
हर ग़म मेरा खो जाता है।
सांवली सूरत की रौनक में,  
बुझा बुझा मेरा दिन रौशन हो जाता है।*😊   
*उसकी हँसी के फूलों से,  
महक जाता मेरा लम्हां लम्हां
**सुर्ख लिवास में वो सांवली सी,  
कंटिली झाड़ियों में 
खिला जंगली फूल जैसे लेंटाना।  
ओस भरी आंखों वाली 
वो मटमैली सी नायिका
मेरी अधूरी रचना।

मिट्टी सी सोंधी खुशबू 
उसके दामन में 
दरियाई गिट्टी की खनक 
उसकी पायल में 
छवि बस गई 
मेरे दिल-चमन में,  
हल्की हल्की बातों की मिश्री 
घुले गई धड़कन में 
धूल सी उड़ती 
रेत सी निखरती 
वो इक दिलकश हसीना 😊
**सुर्ख लिवास में वो सांवली सी,  
कंटिली झाड़ियों में 
खिला जंगली फूल जैसे लेंटाना।  
ओस भरी आंखों वाली 
वो मटमैली सी नायिका
मेरी अधूरी रचना। 

                                   अजनबी 





सोमवार, 9 जून 2025

"तेरी यादों के साये....."

गर्म हवाओं में, तेरी यादों के साये 
जून की दोपहरी में मुझ से मिलने आएं 🎶
गर्म हवाओं में, तेरी यादों के साये 
जून की दोपहरी में मुझ से मिलने आएं 🎶

तपती राहों में  
तेरे एहसास की ठंडक मिलती है,
लम्हा लम्हा तेरी याद में  
जिंदगी कुछ तो हसीन लगती है।
तपती राहों में  
तेरे एहसास की ठंडक मिलती है,  
लम्हा लम्हा तेरी याद में  
जिंदगी कुछ तो हसीन लगती है।
तेरी मुस्कराहटों में 
ये जहां इक सपना लगे.. 
तेरी यादों से 
दिल को ठिकाना लगे।  
तेरी छांव में 
हर मौसम सुहाना लगे,  
गर्मी की दोपहर भी 
अब प्यारी लगे,  
तेरी यादों के साए में 
ये धूप भी न्यारी लगे। 🌸

इस मौसम को तुम्हें ही 
मानों जान लिया है 
तेरी ही छांव में हैं 
तेरा ही साया इसे मान लिया है
इस मौसम को तुम्हें ही 
मानों जान लिया है 
तेरी ही छांव में हैं 
तेरा ही साया इसे मान लिया है  
धूप सुहानी हर आलम दिवाना लगे 
तेरी यादों से 
दिल को ठिकाना लगे 
तेरी छांव में 
हर मौसम सुहाना लगे  
गर्मी की दोपहर भी 
अब प्यारी लगे,  
तेरी यादों के साए में 
ये धूप भी न्यारी लगे। 

जब थक जाए दिल इन राहों में,  
तेरी मुस्कान जैसे बारिश की बूंद।  
हर दर्द को छूकर गुजर जाती है,  
तेरी यादें बन जाएं मीठा सा सुकून।
जब थक जाए दिल इन राहों में,  
तेरी मुस्कान जैसे बारिश की बूंद।  
हर दर्द को छूकर गुजर जाती है,  
तेरी यादें बन जाएं मीठा सा सुकून।


तेरी यादों से 
दिल को ठिकाना लगे 
तेरी छांव में 
हर मौसम सुहाना लगे  
गर्मी की दोपहर भी 
अब प्यारी लगे,  
तेरी यादों के साए में 
ये धूप भी न्यारी लगे।  

मंगलवार, 8 अप्रैल 2025

"शायद इस शायद पर"

हो ...हो... हा ..हा ..पन्ने 
पन्ने फड़फड़ाएं मेंढ़ों पर 
मेंढ़ों पर ....
मैं शायरी लिखूं .....
मैं शायरी लिखूं 
गद्दण पर भेड़ों पर 
अक्सर अक्षर ....अक्षर
उड़ें फिजाओं में ... 
फिजाओं में 
मैं तुम्हें महसूस करुं
महसूस करुं,
करुं, हवाओं में 
गुज़रे लम्हों का 
कहां वो नजारा मिले 
गुज़रे लम्हों का 
कहां वो नजारा मिले 
तुम दो चोटियां करके आओ 
और मैं वस्ता लेके तेरे पीछे चलूं 
तुम दो चोटियां करके आओ 
और मैं वस्ता लेके तेरे पीछे चलूं 
शायद इस शायद पर फूल दोबारा खिलें 
शायद इस शायद पर फूल दोबारा खिलें 
फूल दोबारा खिलें.....

ऊंचे पहाड़ से 
अपना गांव घर देखूं  
अपना गांव घर देखूं 
दूर बड़ी दूर .....
दूर, धुंधली सी 
तेरी झलक देखूं 
तेरी झलक देखूं 
बरसात हो 
झकरने गिरें फुहारें गिरे 
फुहारें गिरे...
उफान पर हो इश्क ए दरिया 
इश्क़ ए दरिया 
दोनो किनारे पागल निरे ....
दोनों पागल निरे
बीते जमाने उम्र बीती 
बीती उम्र 
आज भी लगते बही सिलसिले 
बही सिलसिले....
तुम बरसात में भीगती चलो 
और मैं तुम्हें गिरते गिरते बचा लूं 
तुम बरसात में भीगती चलो 
और मैं तुम्हें गिरते गिरते बचा लूं 
शायद इस शायद पर भूले दोबारा मिलें 
शायद इस शायद पर भूले दोबारा मिलें 
भूले दोबारा मिलें....

किनारे से गहरा पानी निहारुं 
किनारे से गहरा पानी निहारुं 
सदाओं में... 
सदाओं में तुम्हें पुकारुं 
हो...
सदाओं में तुम्हें पुकारुं 
हवाओं में तेरी चुनरी उड़ती आए 
हवाओं में तेरी चुनरी उड़ती आए 
तेरी चुनरी उड़ती आए 
झूम के बाहों में भर लूं 
....हो... झूम के बाहों में भर लूं
तू मुझसे मिलने आऐ 
जब तू मुझसे मिलने आए 
बेशक ए इश्क़ 
बेशक ए इश्क़ तू जालिम है 
तू जालिम है 
पर नहीं हैं तुमसे कोई गिले 
नहीं तुम से कोई गिले 
तुम आज से ...
तुम आज से ..तुम आज से थोड़ा पीछे चलो 
थोड़ा पीछे चलो 
और मैं जरा कल में जी लूं 
और मैं जरा कल में जी लूं 
कल में जी लूं 
शायद इस शायद पर हम दोबारा मिलें 
शायद इस शायद पर हम दोबारा मिलें 
हम दोबारा मिलें....

मंगलवार, 1 अप्रैल 2025

"...वो ...पागल"

भूख से त्रस्त पशु 
जैसे हरियाली देखता है 
ऐसे देखता रहा 
.वो ...पागल
डोलता हरा लिवास 
जैसे मैं तुम्हें देखता हूं


प्यास से बेहाल पंछी 
जैसे दरिया देखता है 
ऐसे देखता रहा 
...वो ...पागल 
झिलमिलाता दृश्य 
जैसे मैं तुम्हें देखता हूं 


विरह से व्यथित प्रेमी 
जैसे प्रेयसी देखता है 
ऐसे देखता रहा 
...वो... पागल 
उस शख्सियत को 
जैसे मैं तुम्हें देखता हूं 
 

                                      अजनबी 

गुरुवार, 27 मार्च 2025

"पनघट सुंदर लगता है"

जब सुबह दिन उगता है 
पनघट सुंदर लगता है 
कलरव करते पंछी 
कल-कल बहता पानी 
जब कोई घड़ा लेकर चलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
जब सुबह सूरज उगता है 
पनघट सुंदर लगता है 

जब सूरज आग उगलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
निर्मल शीतल 
जल की ओक प्यास बुझाती है 
थके हारों में ताजगी भर जाती है 
राहगीर फिर राह पर चलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
जब सूरज आग उगलता है 
पनघट सुंदर लगता है 

जब सांझ को दिन ढलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
झिंगुर रागिनी गाएं 
उड़ते जुगनू जगमगाएं 
प्रेम एहसास मचलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
जब सांझ को दिन ढलता है 
पनघट सुंदर लगता है 



"नल तो आज कल की सोगात हैं 
हमने तो कई सुबह शाम गुजारे हैं पनघट पर"

"ए इश्क़ गुजरो तो कभी उस पनघट से 
ये अजनबी बैठा मिलेगा बहीं पनघट पर"

                                            अजनबी 

बुधवार, 26 मार्च 2025

वो दिल कहां से लाएं

इक जद्दोजहद है जिंदगी 
तेरी चाहतों से थोड़ी आसान लगे 
उड़ता परिंदा हूं 
ओझल हो जाऊं 
दुनिया की नजरों से 
कितना हसीन 
ये आसमान लगे 
तू हमदर्द 
सर्द धुंध सा मेरे अगल-बगल 
तेरे सिवा कुछ न दिखे 
घुल गया है मेरे वजूद में 
खुशबू सा 
न महके ऐसा क्या आजमाएं 
तुम्हें सोच के न हर्षाए 
जो तुम्हें न चाहे 
वो दिल कहां से लाएं 

दुश्वारियों में गुजर-बसर है 
तेरी आहटों से 
सोहराते सामान लगे 
अजनबी हूं 
खो जाऊं अनजानी राहों में 
कितना बेगाना ये जहां लगे 
तू परछाई सायों सा 
मेरे इर्द-गिर्द 
तेरे ओज से 
उजालों में भी कुछ न दिखे 
ज़हन में बसा है जो 
अपना बन के गैर है वो 
कैसे खुद को समझाएं 
मुझे न सताए जो 
तुम्हें न चाहे 
वो दिल कहां से लाएं 

मूक सन्नाटे 
कभी जोरों का 
कोलाहल है यहां 
तेरी मुस्कराहटों से 
संगीतमय ये ज़हान लगे 
तू आसमानी परी सी 
छुपा ले अपने आगोश में 
ये दर्द अब अन सहा लगे 
धूप रोशनी हवाओं सी 
मेरे आस-पास 
महसूस हो पर न दिखे 
सपनों में आती है 
हकीकत में नहीं 
भ्रम है असल नहीं 
छलावे से कैसे खुद को बचाएं 
मुझे न फंसाए 
जो तुम्हें न चाहे 
वो दिल कहां से लाएं 

                                           अजनबी 

सोमवार, 3 मार्च 2025

मेरे घर आंगन बसंत आया.....

देखो वो कोंपलों 
लदी टहनियां....... 🌿☘️🍀🌾
मानों प्रकृति ने 
नन्हें-नन्हें फूलों 
से बाग़ अपना 
अनंत सजाया 
मेरे घर आंगन वसंत आया 
🥀🌹🌼🌻🏵️🌸🌺🌷
देखो वो
हंसता सूरज....... ☀️🌤️⛅🌥️☀️🌤️
मानो अलौकिक 
किरणों की 
गर्माहट लेकर 
नील गगन से 
कोई तंत आया 
मेरे घर आंगन बसंत आया
🍀☘️🌷🌺🌹🥀🌼🌸
देखो वो 
सफेद फूल....... 🌸🌻🌼🏵️🌸🏵️🌻🌼
मानों ईश्वरीय
मुस्कान लेकर 
कोई संत आया 
मेरे घर आंगन बसंत आया 
🏵️🌸🌻🌹🌺🌷🌿🌾

                                                                   ✍️...अजनबी