धो दिए सब उसने,
मेरे भावों के छींटे —
जो उसकी रूह पर लगे थे।
अब वह निश्चल है,
जैसे आरती का ठहरा जल,
निर्मल है —
जैसे गंगा में विलीन हो गया हो सब कुछ।
अब उसकी स्मृति-पटल पर
नहीं कोई मेरा ख्याल,
बुद्धमयी शांति ठहरी है वहाँ —
जहाँ मेरे भाव विचरते थे।
वाह रे करवा,
विरही को त्याग,
शांत बुद्ध में विलीन हो गया रे तू।
अब प्रेम नहीं,
समाधि बन गया —
मन झर गया,
बस शून्य रह गया रे मैं।
अजनबी
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