शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

"वाह रे करवा"

तन-मन की साधना से पहले,
धो दिए सब उसने,
मेरे भावों के छींटे —
जो उसकी रूह पर लगे थे।

अब वह निश्चल है,
जैसे आरती का ठहरा जल,
निर्मल है —
जैसे गंगा में विलीन हो गया हो सब कुछ।

अब उसकी स्मृति-पटल पर
नहीं कोई मेरा ख्याल,
बुद्धमयी शांति ठहरी है वहाँ —
जहाँ मेरे भाव विचरते थे।

वाह रे करवा,
विरही को त्याग,
शांत बुद्ध में विलीन हो गया रे तू।

अब प्रेम नहीं,
समाधि बन गया —
मन झर गया,
बस शून्य रह गया रे मैं।

                                    
                                             अजनबी 

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