मंगलवार, 29 जुलाई 2025

इश्क ए शराब


सन्नाटा था दिल में गहरा
उसकी आहट ने जैसे छू लिया सवेरा 


उसकी आहट से मेरी 
तो दुनियां निखर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई  

इश्क ए शराब के आगे 
नशा ए शराब कुछ नहीं 
एक उतरा एक चढ़ गया 
इसमें मेरा लगा कुछ नहीं 
मुस्कान जैसे बिजुरिया 
घटाएं चांद पर आकर बिखर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई  

रोशन हुए मेरे 
दरों-दीवार उसके आने से  
फिर बेकरार हुआ 
ये दिल उसके जाने से 
अंधेरे में जुगनू की महफिलें 
पल भर में न जाने किधर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई  


दिल की तासीर को 
आखिर महकदा याद आया  
मैंने देखा, उसने देखा मुझे, 
हाले दिल सारा साकी को सुनाया 
जाते-जाते उसकी 
खामोशी में इक बात रह गई
उसकी आहट से मेरी 
तो दुनियां निखर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई 

                               अजनबी 

रविवार, 27 जुलाई 2025

"अरमान बहीं"

चलते रहे हम वक़्त की राहों में
तेरे मेरे हिस्से थे कुछ गवाहों में
तू हँसा कहीं, मैं रोया कहीं
फिर भी दिल कहता रहा तू यहीं
शरीर बूढ़े होते हैं, चाहत नहीं
हम भी वहीं, तुम भी वहीं
वक्त बदल गया
मगर अरमान बहीं…"

तस्वीरों में अब भी वही रंग हैं
साँसों में तेरे नाम के संग हैं
तू जो नज़रों से ओझल सही
पर दिल के आईने में तू ही तू रही
"शरीर बूढ़े होते हैं, चाहत नहीं
हम भी वहीं, तुम भी वहीं
वक्त बदल गया
मगर अरमान बहीं…"

कभी चिट्ठियों में, कभी ख़्वाबों में
तेरे बिना अधूरे हर जवाबों में
आज भी धड़कन कहती यही
"वो मोहब्बत अब भी है सही…"
"शरीर बूढ़े होते हैं, चाहत नहीं
हम भी वहीं, तुम भी वहीं
वक्त बदल गया
मगर अरमान बहीं… 

                                                   अजनबी 



शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

" रंग भर रहा हूं "

रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं 

फीके पड़ गये जो लफ्ज़ 
तेरे मेरे नाम दर्ज 
उनमें उमंग भर रहा हूं 
हुई न कभी जो बातचीत 
तेरे मेरे बीच 
कुछ अनकहे प्रसंग भर रहा हूं 
रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं   

जमीन से बंधी डोर है 
हुनर वाज परिंदे चारों ओर है 
आसमान पाने की चाह में 
इन हवाओं से जंग लड़ रहा हूं
ख्वाबों के आसमान में
तेरी तलाश में 
कच्ची डोर से बंधा
मैं पतंग बन रहा हूं 
रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं 

दूरियों के जो दरमियां 
तेरी मेरी हैं खामोशियां 
उनमें मीठी तरंग भर रहा हूं 
रह गई तेरी बाहों की 
गुल्फों से जो कुछ नज़ाकतें 
रह गई तेरी जुल्फों से 
जो कुछ शरारतें 
उस मस्ती में भंग भर रहा हूं
रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं 

                                           अजनबी 

मंगलवार, 15 जुलाई 2025

"वे सजणा "

भरे विराने च तू  मुस्काया,  
किसी डर ने तैनू सहमाया।  
तेरे कोल कोल रहणे नूं 
जी करदा वे सजणा 
हर बरी तू लुकदा छुपदा 
काह्नों तड़फादां 
काह्नों सतांदा वे सजणा 
असां तेरी बेरुखी नाल मर जाणा
मेरी दिल बगिया दा तू सोणा फुल वे सजणा 
तू सोणा फुल वे सजणा 
आजा मेरे कोल हाकिमा 
एह वेला फिर नी मिलणा
एह वेला फिर नी मिलणा

तू बदलां दा उजाला नीर 
असीं चिकड़गारा वे सजणा, 
तेरे पावन ओज नाल 
बस मुक जाणा वे सजणा 
बण के धूल तेरी राह विच 
बिछाणा,  
दिल, जिंद, जान सब हार जाणा।  
तेतों नी जितणा वे सजणा, 
तेतों नी जितणा वे सजणा,   
सोणी सोणी मुस्कान नाल 
निहाल कर आसिमा
एह फुल फिर नी खिलणा
एह फुल फिर नी खिलणा

मेरे ख्वाबां दी तू रौनक 
असां तेरी बेरुखियां दे सोगी वे सजणा 
मेरे ख्वाबां दी तू रौनक
असां तेरी बेरुखियां दे सोगी वे सजणा 
मुल्कां मुल्कां दी तू बंजारन 
असां पहाड़ां दे जोगी वे सजणा 
मुल्कां मुल्कां दी तू बंजारन 
असां पहाड़ां दे जोगी वे सजणा 
तेरी बिरह दे धूणे बिच जल के 
तेरे नाम दा अलख जगाणा वे सजणा 
चाहे तूं मुड़ ना देख जालिमा 
असां सो बार मर के भी 
तेनु ही चाहणा वे सजणा 
चाहे तूं मुड़ ना देख जालिमा 
असां सो बार मर के भी
तेनु ही चाहणा वे सजणा 
तेनु ही चाहणा वे सजणा