रविवार, 16 नवंबर 2025

"वक्त मुकर्रर है "


💔  “वक़्त मुक़र्रर है”


ठहर जा मेरे साथ ही,
ढलती शाम तक,
पाबंद है बड़ा,
वक़्त अपने वक़्त का।
जो  वक़्त आ गया,
तो कौन तेरे लिए बेकरार होगा।
             
         🌿🌸 🌿

थोड़ी देर ही सही,
अपनी सूरत 
मेरी आँखों के पास तो रख,
बंद हो जाएँगी ये आँखें,
तो फिर कहाँ दीदार होगा।
            
          🌿🌸🌿

एक वो है,
जो पास आती जा रही है,
और एक तू है,
जो दूर चली जाती है।
तेरे आने से पहले वो आ गई तो,
फिर कहाँ हमसे तेरा इंतज़ार होगा।
            
          🌿🌸🌿

चलो मैं ही ग़लत सही,
जो ऊँचे आसमाँ को चाहने लगा,
पर देखो, वक़्त भी मुक़र्रर है,
आएगा तो लेकर ही जाएगा,
फिर कहाँ इस जन्म में तुमसे प्यार होगा। 
           
           🌿🌸🌿
                                               
                                                अजनबी