शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

"ओ रब्बा....."

तू कहां वाकिफ है 
हकीकत हमारी से
तू क्या जाने 
कितना दो चार 
होते हैं दुनियां दारी से 

नमक तेल आटा 
तो कभी तरकारी नहीं 
कोई साधन सरकारी नहीं 
रोज लड़ते हैं लाचारी से 
ओ रव्वा .....
तू कहां वाकिफ है
हकीकत हमारी से
तू क्या जाने 
कितना दो चार 
होते हैं दुनियां दारी से 

दिन रात एक करते हैं 
हालात वहीं के वहीं 
सुन ली आंखें मूंद के
जिसने जो कही सही 
नादानों से खेलता आया
जमाना समझदारी से
ओ रब्बा ......
तू कहां वाकिफ है
हकीकत हमारी से
तू क्या जाने कितना
दो चार होते है दुनियादारी से
ओ रब्बा........

                                               अजनबी 

मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

"वो..... और तुम"

वो अड़ोस-पड़ोस आंगन
वो सलोटों का घर
वो हरे खेत खलिहान दरिया
वो तेरा होना मरहम

वो मचान मकई बरसातें
वो मुस्कान तेरी बातें
वो लटों का पानी सावन
वो गठरी घास राह में तेरे कदम

वो सर्दी दुपहरी
वो खुली तेरी जुल्फें
वो दरिया की हवा ठंडी
वो इंतज़ार करना तेरा**


                                                   अजनबी