हकीकत हमारी से
तू क्या जाने
कितना दो चार
होते हैं दुनियां दारी से
नमक तेल आटा
तो कभी तरकारी नहीं
कोई साधन सरकारी नहीं
रोज लड़ते हैं लाचारी से
ओ रव्वा .....
तू कहां वाकिफ है
हकीकत हमारी से
तू क्या जाने
कितना दो चार
होते हैं दुनियां दारी से
दिन रात एक करते हैं
हालात वहीं के वहीं
सुन ली आंखें मूंद के
जिसने जो कही सही
नादानों से खेलता आया
जमाना समझदारी से
ओ रब्बा ......
तू कहां वाकिफ है
हकीकत हमारी से
तू क्या जाने कितना
दो चार होते है दुनियादारी से
ओ रब्बा........
अजनबी
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