गुरुवार, 27 मार्च 2025

"पनघट सुंदर लगता है"

जब सुबह दिन उगता है 
पनघट सुंदर लगता है 
कलरव करते पंछी 
कल-कल बहता पानी 
जब कोई घड़ा लेकर चलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
जब सुबह सूरज उगता है 
पनघट सुंदर लगता है 

जब सूरज आग उगलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
निर्मल शीतल 
जल की ओक प्यास बुझाती है 
थके हारों में ताजगी भर जाती है 
राहगीर फिर राह पर चलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
जब सूरज आग उगलता है 
पनघट सुंदर लगता है 

जब सांझ को दिन ढलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
झिंगुर रागिनी गाएं 
उड़ते जुगनू जगमगाएं 
प्रेम एहसास मचलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
जब सांझ को दिन ढलता है 
पनघट सुंदर लगता है 



"नल तो आज कल की सोगात हैं 
हमने तो कई सुबह शाम गुजारे हैं पनघट पर"

"ए इश्क़ गुजरो तो कभी उस पनघट से 
ये अजनबी बैठा मिलेगा बहीं पनघट पर"

                                            अजनबी 

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