गुरुवार, 28 मई 2026

छैल रांझण

 भला छैल रांझणा हो.....ओ..हो....
मेरे दिले च फोटो तेरा 
तेरी सो 
दिले च फोटो तेरा 
जी भर गलां करना दे..... 
करना दे... हो... ओ... हो... 
फिरी असां कुथु मिलणा 
गलां करना दे  
भला छैल रांझणा हो.....ओ..हो....
मेरे दिले च फोटो तेरा 
तेरी सो 
दिले च फोटो तेरा 
जी भर गलां करना दे..... 

भला छैल रांझणा हो....ओ....हो....
जेठ महीने दीआं धुप्पां 
तेरी सो 
जेठ महीने दीयां धुप्पां
चुनियां ताणी दे ....
ताणी दे ...हो.. ओ...हो...
बड़ियाँ चुभदियां धुप्पां
चुनियां ताणी दे ....
भला छैल रांझणा हो.....ओ..हो....
मेरे दिले च फोटो तेरा 
तेरी सो 
दिले च फोटो तेरा 
जी भर गलां करना दे.... 
करना दे हो... ओ ...हो..

भला छैल रांझणा हो ...ओ....हो....
सिओरे दीया बाईं 
तेरी सो 
सिओरे दीया बाईं 
पाणी पीणा दे ....
पीणा दे हो... ओ ...हो.. 
चलदियां चलदियां मुंह सुकदा 
पाणी पीणा दे ....
भला छैल रांझणा हो.....ओ..हो....
मेरे दिले च फोटो तेरा 
तेरी सो 
दिले च फोटो तेरा 
जी भर गलां करना दे...

 भला छैल रांझणा हो... ओ... हो...
झुलदे पुले दे राहीं 
तेरी सो 
झुलदे पुले दे राहीं 
सोगी चलणा दे .....
चलणा दे हो...ओ ...हो .. 
कल्लिया मिजों डर लगदा 
सोगी चलणा दे .....
भला छैल रांझणा हो.....ओ..हो....
मेरे दिले च फोटो तेरा तेरी सो 
दिले च फोटो तेरा 
जी भर गलां करना दे....

भला छैल रांझणा हो ....ओ.... हो
टोरु बड़ी दे टयालें 
तेरी सो 
टोरु बड़ी दे टयालें
वोणा दे.... 
वोणा दे हो ..ओ... हो.. 
चलदियां चलदियां पैर दुखदे
वोणा दे.... 
भला छैल रांझणा हो.....ओ..हो....
मेरे दिले च फोटो तेरा 
तेरी सो दिले च फोटो तेरा 
जी भर गलां करना दे.....

भला छैल रांझणा हो.... ओ... हो
चौगाने पेई गेई रात 
तेरी सो 
चौहाने पेई गेई रात
राती रेणा दे ...
रेणा दे हो ...ओ... हो...
मैं कल्ली नार
राती रेणा दे ...
भला छैल रांझणा हो.....ओ..हो....
मेरे दिले च फोटो तेरा तेरी सो 
दिले च फोटो तेरा 
जी भर गलां करना दे..... करना दे 


बुधवार, 20 मई 2026

"कच्चे फल "

द्वार नाचती चूड़ियां
कामिनी सृष्टि सी
मध्यमा सहायक
असीमतृप्ति की

तरुणाई के
शुरुआती सावन थे
जंहन विचरते
नंगे मजाक सखियन के

रसिक भौंरे ताक में
रहते मौके की
चाहत रखते
मधुरस झौंके की

भोगी भिक्षा
मांगें भोगन से
आतुर अधम
घूरते गलियन के

खैर खेवईया
न कोई माली
मनचला पंखुड़ियां
बिखेर गया रस बाली

अभी झाड़ नहीं
उगे थे यौवन के
कच्चे फल थे
अभी बगियन के 

                          अजनबी 

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

"फिर सोचता हूं"

जैसे तू नये दरों दीबार
मेरे भरोसे जोड़ता है
सीमेंट कहता है
चल तेरे टूटे अरमान जोड़ दूं
फिर सोचता हूं
जुड़े अरमानों से भी
मैं उनके कारवां में
कहां शामिल

जैसे तू मेरे मिश्रण से
घर वार बनाता है
कंक्रीट कहता है
चल उसका मूर्त बनाएं
फिर सोचता हूं वो
मूर्त क्या समझेगी
और पत्थर एहसास के
कहां काबिल

जैसे तू मेरे सहारे 
उसके सपने गढ़ता है
दिल कहता है
चल उनका दीदार करें
फिर सोचता हूं
वो तो गैर है
और गैरों के दीदार से
क्या हासिल

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

🌸"मेरे लिए तू "🌸

बटली
थोड़ी कचगिरी 
कसैली
थोड़ी मिश्रीभरी 
बाग है फलों का
भावों के दाम है
आम होगी तू
आम लोगों के लिए
मेरे लिए तो लीची बादाम है 

🌸🌿🌸🌿🌸

कड़वी 
थोड़ी रंग में 
थोड़ी नशीली 
मेरे जहन में 
तन मन डोलती 
कोई बदनाम है
सिकंजवी शरवत होगी तू
सबके लिए
मेरे लिए तो
वोदका व्हिस्की जाम है

🌸🌿🌸🌿🌸

आध्यात्मिक
थोड़ी भौतिक
व्यवहारिक 
थोड़ी अलौकिक
रुह की दौड़ के
आगे विराम है
संसारिक रीत होगी तू
आवाम के लिए
मेरे लिए तो राम ही राम है 

🌸🌿🌸🌿🌸

                                        अजनबी 

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

"दो चोटियां की शर्त "


दुनियावी किर्तिमान 
शोहरतों के सामान 
भूल के आना।
उँगलियों में फँसाए एक पेन,
दो किताबें हाथ में लेकर आना—
अबकी बार आना तो
दो चोटियाँ लहराते आना।

सितारों जड़ी चुनरी,
खनकती चूड़ियाँ
साथ मत लाना।
एहसास का नीला दुपट्टा,
सूच्चे प्रेम सा उजला लिवास
पहन के आना।
अबकी बार आना तो
दो चोटियाँ लहराते आना

मांग का सिंदूर 
माथे की बिंदिया 
सजा के न लाना।
रात-रंगी कजरारी आँखें,
हल्के गुलाबी रंगे होंठ,
मिट्टी-रंगी अपनी मिट्टी लाना—
अबकी बार आना तो
दो चोटियाँ लहराते आना। 

                                     अजनवी 

बुधवार, 21 जनवरी 2026

"जहां देखें तुम्हें देखें "

जहां देखें तुम्हें देखें 
तुम्हें देखें या 
ये जहां देखें 
तू ही बता 
हम क्या देखें?
कश्मीर देखें,
या तेरा लिबास देखें।
तुझे अपने करीब 
या खुद को 
तेरे पास देखें।
तुझे बाहों में 
या तेरी वुक्कल में
खुद को देखें, 
कश्मीर देखें 
या तेरा लिबास देखें 
जहां देखें तुम्हें देखें 
तुम्हें देखें या 
ये जहां देखें 
तू ही बता 
हम क्या देखें ?

नथनी की 
शोहरत देखें,
या सूरत की सादगी देखें।
होंठों की कलियाँ,
या आँखों की मादगी देखें।
लेखनी सुस्ता रही कहीं—
मेरे लफ़्ज़ों की आवारगी देखें। 
नथनी की शोहरत देखें 
या सूरत की सादगी देखें 
जहां देखें तुम्हें देखें 
तुम्हें देखें 
या ये जहां देखें 
तू ही बता,
हम क्या देखें?

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

"ओ रब्बा....."

तू कहां वाकिफ है 
हकीकत हमारी से
तू क्या जाने 
कितना दो चार 
होते हैं दुनियां दारी से 

नमक तेल आटा 
तो कभी तरकारी नहीं 
कोई साधन सरकारी नहीं 
रोज लड़ते हैं लाचारी से 
ओ रव्वा .....
तू कहां वाकिफ है
हकीकत हमारी से
तू क्या जाने 
कितना दो चार 
होते हैं दुनियां दारी से 

दिन रात एक करते हैं 
हालात वहीं के वहीं 
सुन ली आंखें मूंद के
जिसने जो कही सही 
नादानों से खेलता आया
जमाना समझदारी से
ओ रब्बा ......
तू कहां वाकिफ है
हकीकत हमारी से
तू क्या जाने कितना
दो चार होते है दुनियादारी से
ओ रब्बा........

                                               अजनबी 

मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

"वो..... और तुम"

वो अड़ोस-पड़ोस आंगन
वो सलोटों का घर
वो हरे खेत खलिहान दरिया
वो तेरा होना मरहम

वो मचान मकई बरसातें
वो मुस्कान तेरी बातें
वो लटों का पानी सावन
वो गठरी घास राह में तेरे कदम

वो सर्दी दुपहरी
वो खुली तेरी जुल्फें
वो दरिया की हवा ठंडी
वो इंतज़ार करना तेरा**


                                                   अजनबी 

रविवार, 16 नवंबर 2025

"वक्त मुकर्रर है "


💔  “वक़्त मुक़र्रर है”


ठहर जा मेरे साथ ही,
ढलती शाम तक,
पाबंद है बड़ा,
वक़्त अपने वक़्त का।
जो  वक़्त आ गया,
तो कौन तेरे लिए बेकरार होगा।
             
         🌿🌸 🌿

थोड़ी देर ही सही,
अपनी सूरत 
मेरी आँखों के पास तो रख,
बंद हो जाएँगी ये आँखें,
तो फिर कहाँ दीदार होगा।
            
          🌿🌸🌿

एक वो है,
जो पास आती जा रही है,
और एक तू है,
जो दूर चली जाती है।
तेरे आने से पहले वो आ गई तो,
फिर कहाँ हमसे तेरा इंतज़ार होगा।
            
          🌿🌸🌿

चलो मैं ही ग़लत सही,
जो ऊँचे आसमाँ को चाहने लगा,
पर देखो, वक़्त भी मुक़र्रर है,
आएगा तो लेकर ही जाएगा,
फिर कहाँ इस जन्म में तुमसे प्यार होगा। 
           
           🌿🌸🌿
                                               
                                                अजनबी 


शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

"वाह रे करवा"

तन-मन की साधना से पहले,
धो दिए सब उसने,
मेरे भावों के छींटे —
जो उसकी रूह पर लगे थे।

अब वह निश्चल है,
जैसे आरती का ठहरा जल,
निर्मल है —
जैसे गंगा में विलीन हो गया हो सब कुछ।

अब उसकी स्मृति-पटल पर
नहीं कोई मेरा ख्याल,
बुद्धमयी शांति ठहरी है वहाँ —
जहाँ मेरे भाव विचरते थे।

वाह रे करवा,
विरही को त्याग,
शांत बुद्ध में विलीन हो गया रे तू।

अब प्रेम नहीं,
समाधि बन गया —
मन झर गया,
बस शून्य रह गया रे मैं।

                                    
                                             अजनबी 

---

रविवार, 5 अक्टूबर 2025

कितना खूबसूरत चांद

कौन से आसमां से उतर आया,
या मेरी चाहत से खिंचा आया।

धुंधले उजाले में टकटकी लगाए,
देखता मुझे, मैं उसे...
चुप्पियों में गुफ़्तगू सा साया।

देखो तो कितना ख़ूबसूरत चांद
अटका है मेरी दीवार पर,
झूम उठता है यह दिल
उसमें देख तेरी छाया। 

                                         अजनबी 

सोमवार, 1 सितंबर 2025

हे गिरधर.....

हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा।

पर्वत बन गए गारा,
धँस रही गीली धरा,
क्या करे हिमालय बेचारा।
हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा।


दुनिया डोले संकट भारी,
नदियाँ उफनें, डूबी धरती सारी,
मेघों ने फैलाया अंधियारा।
हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा।

भटके मन को राह दिखा दे,
डूबती नैया पार लगा दे,
तेरा ही है नाम सहारा।
हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा। 


                                          अजनबी 



शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

"सहूलियत"

कुछ तो सहूलियत
दी है सरकार ने,
चौबीसों घंटे
मिलते हैं दरबार में।

एक हल्का-सा स्पर्श,
और रूबरू हो जाते हैं,
शुक्र है, ब्रह्म मुहूर्त में
हम उन्हें देख पाते हैं। 

                     अजनबी 

रविवार, 17 अगस्त 2025

तुझे ही देखता हूं

कल से कुछ नहीं देखता हूं, सिर्फ़ तुझे देखता हूं
तेरी आँख में जैसे अपना जहाँ देखता हूं


तेरी ख़ामुशी दिल में गूँज उठे सदा बनकर
उस सदा में मैं कोई कारवाँ देखता हूं


चाँदनी में तेरा ही चेहरा झलक उठे अक्सर
रात की गोद में तेरा आसमां देखता हूं


तेरी सूरत के साए हर मोड़ पे मिल ही जाते
उन सायों में तेरा इक निशां देखता हूं


लोग कहते हैं अजनबी इश्क़ में हुआ है अंधा
हाँ मैं अंधा बस तुझे ही देखता हूं 


                                              अजनबी 

सोमवार, 11 अगस्त 2025

"मैं इक खुफिया कलाकार "

दिल के मौसम लिखता रहा,
पर किसी ने न जाना, मेरा संसार।
जिसे पहचान ना पाए यार 
ओ.....मैं इक खुफिया कलाकार


भीड़ में तन्हा, मैं चलता रहा,
लफ़्ज़ों में अपना दिल रखता रहा,
ज़माने को बस शोर था प्यारा,
मैं चुपचाप अपना गीत गाता रहा। 
सुर्खियों में नहीं निकला मैं गीतकार 
जिसमें जज्बात बेशुमार 
ओ.... मैं इक खुफिया कलाकार

मेरी ग़ज़लों में हैं रंग हज़ार,
मेरी कविताएं उसके दिल के द्वार,
पर सबको थी बस जल्दी की हवा,
किसे फुर्सत थी बैठ कर सुने ज़रा। 
अजीज महफिलों से रहा दरकिनार 
जिसके दिल द्वार लफ्ज़ बेशुमार 
...... मैं खुफिया कलाकार 

लोगों की नज़रें, आगे-आगे,
दिल की किताबें, पीछे रह जाएँ,
मैंने जो कहा, वो सुन न सके,
जो महसूस हुआ, वो समझ न सके।
ये जितने बेपरवाह मैं उतना वफ़ादार 
जज्बों का सौदागर ख्वाबों का सरदार 
ओ...... मैं इक खुफिया कलाकार

एक दिन शायद, हवा बदलेगी,
किसी की नज़र मेरी कलम पढ़ लेगी,
फिर मेरा नाम, आसमान छू लेगा,
और मेरा गीत, सबके दिल में गूंजेगा 

रातों में लिखूँ, सुबहों में गाऊँ,
अपनी रूह का राज़, शब्दों में समाऊँ। 
दिल मैं संभाले जज्बात हजार 
तब तक मैं .....खुफिया कलाकार 

                                     अजनबी 


मंगलवार, 29 जुलाई 2025

इश्क ए शराब


सन्नाटा था दिल में गहरा
उसकी आहट ने जैसे छू लिया सवेरा 


उसकी आहट से मेरी 
तो दुनियां निखर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई  

इश्क ए शराब के आगे 
नशा ए शराब कुछ नहीं 
एक उतरा एक चढ़ गया 
इसमें मेरा लगा कुछ नहीं 
मुस्कान जैसे बिजुरिया 
घटाएं चांद पर आकर बिखर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई  

रोशन हुए मेरे 
दरों-दीवार उसके आने से  
फिर बेकरार हुआ 
ये दिल उसके जाने से 
अंधेरे में जुगनू की महफिलें 
पल भर में न जाने किधर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई  


दिल की तासीर को 
आखिर महकदा याद आया  
मैंने देखा, उसने देखा मुझे, 
हाले दिल सारा साकी को सुनाया 
जाते-जाते उसकी 
खामोशी में इक बात रह गई
उसकी आहट से मेरी 
तो दुनियां निखर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई 

                               अजनबी 

रविवार, 27 जुलाई 2025

"अरमान बहीं"

चलते रहे हम वक़्त की राहों में
तेरे मेरे हिस्से थे कुछ गवाहों में
तू हँसा कहीं, मैं रोया कहीं
फिर भी दिल कहता रहा तू यहीं
शरीर बूढ़े होते हैं, चाहत नहीं
हम भी वहीं, तुम भी वहीं
वक्त बदल गया
मगर अरमान बहीं…"

तस्वीरों में अब भी वही रंग हैं
साँसों में तेरे नाम के संग हैं
तू जो नज़रों से ओझल सही
पर दिल के आईने में तू ही तू रही
"शरीर बूढ़े होते हैं, चाहत नहीं
हम भी वहीं, तुम भी वहीं
वक्त बदल गया
मगर अरमान बहीं…"

कभी चिट्ठियों में, कभी ख़्वाबों में
तेरे बिना अधूरे हर जवाबों में
आज भी धड़कन कहती यही
"वो मोहब्बत अब भी है सही…"
"शरीर बूढ़े होते हैं, चाहत नहीं
हम भी वहीं, तुम भी वहीं
वक्त बदल गया
मगर अरमान बहीं… 

                                                   अजनबी 



शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

" रंग भर रहा हूं "

रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं 

फीके पड़ गये जो लफ्ज़ 
तेरे मेरे नाम दर्ज 
उनमें उमंग भर रहा हूं 
हुई न कभी जो बातचीत 
तेरे मेरे बीच 
कुछ अनकहे प्रसंग भर रहा हूं 
रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं   

जमीन से बंधी डोर है 
हुनर वाज परिंदे चारों ओर है 
आसमान पाने की चाह में 
इन हवाओं से जंग लड़ रहा हूं
ख्वाबों के आसमान में
तेरी तलाश में 
कच्ची डोर से बंधा
मैं पतंग बन रहा हूं 
रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं 

दूरियों के जो दरमियां 
तेरी मेरी हैं खामोशियां 
उनमें मीठी तरंग भर रहा हूं 
रह गई तेरी बाहों की 
गुल्फों से जो कुछ नज़ाकतें 
रह गई तेरी जुल्फों से 
जो कुछ शरारतें 
उस मस्ती में भंग भर रहा हूं
रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं 

                                           अजनबी 

मंगलवार, 15 जुलाई 2025

"वे सजणा "

भरे विराने च तू  मुस्काया,  
किसी डर ने तैनू सहमाया।  
तेरे कोल कोल रहणे नूं 
जी करदा वे सजणा 
हर बरी तू लुकदा छुपदा 
काह्नों तड़फादां 
काह्नों सतांदा वे सजणा 
असां तेरी बेरुखी नाल मर जाणा
मेरी दिल बगिया दा तू सोणा फुल वे सजणा 
तू सोणा फुल वे सजणा 
आजा मेरे कोल हाकिमा 
एह वेला फिर नी मिलणा
एह वेला फिर नी मिलणा

तू बदलां दा उजाला नीर 
असीं चिकड़गारा वे सजणा, 
तेरे पावन ओज नाल 
बस मुक जाणा वे सजणा 
बण के धूल तेरी राह विच 
बिछाणा,  
दिल, जिंद, जान सब हार जाणा।  
तेतों नी जितणा वे सजणा, 
तेतों नी जितणा वे सजणा,   
सोणी सोणी मुस्कान नाल 
निहाल कर आसिमा
एह फुल फिर नी खिलणा
एह फुल फिर नी खिलणा

मेरे ख्वाबां दी तू रौनक 
असां तेरी बेरुखियां दे सोगी वे सजणा 
मेरे ख्वाबां दी तू रौनक
असां तेरी बेरुखियां दे सोगी वे सजणा 
मुल्कां मुल्कां दी तू बंजारन 
असां पहाड़ां दे जोगी वे सजणा 
मुल्कां मुल्कां दी तू बंजारन 
असां पहाड़ां दे जोगी वे सजणा 
तेरी बिरह दे धूणे बिच जल के 
तेरे नाम दा अलख जगाणा वे सजणा 
चाहे तूं मुड़ ना देख जालिमा 
असां सो बार मर के भी 
तेनु ही चाहणा वे सजणा 
चाहे तूं मुड़ ना देख जालिमा 
असां सो बार मर के भी
तेनु ही चाहणा वे सजणा 
तेनु ही चाहणा वे सजणा 

                                           





गुरुवार, 19 जून 2025

"मेरी अधूरी रचना"

**सुर्ख लिवास में वो सांवली सी,  
कंटिली झाड़ियों में 
खिला जंगली फूल जैसे लेंटाना।  
ओस भरी आंखों वाली 
वो मटमैली सी नायिका
मेरी अधूरी रचना।

*उसकी सादगी के गांव में,  
हर ग़म मेरा खो जाता है।
सांवली सूरत की रौनक में,  
बुझा बुझा मेरा दिन रौशन हो जाता है।*😊   
*उसकी हँसी के फूलों से,  
महक जाता मेरा लम्हां लम्हां
**सुर्ख लिवास में वो सांवली सी,  
कंटिली झाड़ियों में 
खिला जंगली फूल जैसे लेंटाना।  
ओस भरी आंखों वाली 
वो मटमैली सी नायिका
मेरी अधूरी रचना।

मिट्टी सी सोंधी खुशबू 
उसके दामन में 
दरियाई गिट्टी की खनक 
उसकी पायल में 
छवि बस गई 
मेरे दिल-चमन में,  
हल्की हल्की बातों की मिश्री 
घुले गई धड़कन में 
धूल सी उड़ती 
रेत सी निखरती 
वो इक दिलकश हसीना 😊
**सुर्ख लिवास में वो सांवली सी,  
कंटिली झाड़ियों में 
खिला जंगली फूल जैसे लेंटाना।  
ओस भरी आंखों वाली 
वो मटमैली सी नायिका
मेरी अधूरी रचना। 

                                   अजनबी