कामिनी सृष्टि सी
मध्यमा सहायक
असीमतृप्ति की
तरुणाई के
शुरुआती सावन थे
जंहन विचरते
नंगे मजाक सखियन के
रसिक भौंरे ताक में
रहते मौके की
चाहत रखते
मधुरस झौंके की
भोगी भिक्षा
मांगें भोगन से
आतुर अधम
घूरते गलियन के
खैर खेवईया
न कोई माली
मनचला पंखुड़ियां
बिखेर गया रस बाली
अभी झाड़ नहीं
उगे थे यौवन के
कच्चे फल थे
अभी बगियन के
अजनबी