मंगलवार, 15 जुलाई 2025

"वे सजणा "

भरे विराने च तू  मुस्काया,  
किसी डर ने तैनू सहमाया।  
तेरे कोल कोल रहणे नूं 
जी करदा वे सजणा 
हर बरी तू लुकदा छुपदा 
काह्नों तड़फादां 
काह्नों सतांदा वे सजणा 
असां तेरी बेरुखी नाल मर जाणा
मेरी दिल बगिया दा तू सोणा फुल वे सजणा 
तू सोणा फुल वे सजणा 
आजा मेरे कोल हाकिमा 
एह वेला फिर नी मिलणा
एह वेला फिर नी मिलणा

तू बदलां दा उजाला नीर 
असीं चिकड़गारा वे सजणा, 
तेरे पावन ओज नाल 
बस मुक जाणा वे सजणा 
बण के धूल तेरी राह विच 
बिछाणा,  
दिल, जिंद, जान सब हार जाणा।  
तेतों नी जितणा वे सजणा, 
तेतों नी जितणा वे सजणा,   
सोणी सोणी मुस्कान नाल 
निहाल कर आसिमा
एह फुल फिर नी खिलणा
एह फुल फिर नी खिलणा

मेरे ख्वाबां दी तू रौनक 
असां तेरी बेरुखियां दे सोगी वे सजणा 
मेरे ख्वाबां दी तू रौनक
असां तेरी बेरुखियां दे सोगी वे सजणा 
मुल्कां मुल्कां दी तू बंजारन 
असां पहाड़ां दे जोगी वे सजणा 
मुल्कां मुल्कां दी तू बंजारन 
असां पहाड़ां दे जोगी वे सजणा 
तेरी बिरह दे धूणे बिच जल के 
तेरे नाम दा अलख जगाणा वे सजणा 
चाहे तूं मुड़ ना देख जालिमा 
असां सो बार मर के भी 
तेनु ही चाहणा वे सजणा 
चाहे तूं मुड़ ना देख जालिमा 
असां सो बार मर के भी
तेनु ही चाहणा वे सजणा 
तेनु ही चाहणा वे सजणा 

                                           





गुरुवार, 19 जून 2025

"मेरी अधूरी रचना"

**सुर्ख लिवास में वो सांवली सी,  
कंटिली झाड़ियों में 
खिला जंगली फूल जैसे लेंटाना।  
ओस भरी आंखों वाली 
वो मटमैली सी नायिका
मेरी अधूरी रचना।

*उसकी सादगी के गांव में,  
हर ग़म मेरा खो जाता है।
सांवली सूरत की रौनक में,  
बुझा बुझा मेरा दिन रौशन हो जाता है।*😊   
*उसकी हँसी के फूलों से,  
महक जाता मेरा लम्हां लम्हां
**सुर्ख लिवास में वो सांवली सी,  
कंटिली झाड़ियों में 
खिला जंगली फूल जैसे लेंटाना।  
ओस भरी आंखों वाली 
वो मटमैली सी नायिका
मेरी अधूरी रचना।

मिट्टी सी सोंधी खुशबू 
उसके दामन में 
दरियाई गिट्टी की खनक 
उसकी पायल में 
छवि बस गई 
मेरे दिल-चमन में,  
हल्की हल्की बातों की मिश्री 
घुले गई धड़कन में 
धूल सी उड़ती 
रेत सी निखरती 
वो इक दिलकश हसीना 😊
**सुर्ख लिवास में वो सांवली सी,  
कंटिली झाड़ियों में 
खिला जंगली फूल जैसे लेंटाना।  
ओस भरी आंखों वाली 
वो मटमैली सी नायिका
मेरी अधूरी रचना। 

                                   अजनबी 





सोमवार, 9 जून 2025

"तेरी यादों के साये....."

गर्म हवाओं में, तेरी यादों के साये 
जून की दोपहरी में मुझ से मिलने आएं 🎶
गर्म हवाओं में, तेरी यादों के साये 
जून की दोपहरी में मुझ से मिलने आएं 🎶

तपती राहों में  
तेरे एहसास की ठंडक मिलती है,
लम्हा लम्हा तेरी याद में  
जिंदगी कुछ तो हसीन लगती है।
तपती राहों में  
तेरे एहसास की ठंडक मिलती है,  
लम्हा लम्हा तेरी याद में  
जिंदगी कुछ तो हसीन लगती है।
तेरी मुस्कराहटों में 
ये जहां इक सपना लगे.. 
तेरी यादों से 
दिल को ठिकाना लगे।  
तेरी छांव में 
हर मौसम सुहाना लगे,  
गर्मी की दोपहर भी 
अब प्यारी लगे,  
तेरी यादों के साए में 
ये धूप भी न्यारी लगे। 🌸

इस मौसम को तुम्हें ही 
मानों जान लिया है 
तेरी ही छांव में हैं 
तेरा ही साया इसे मान लिया है
इस मौसम को तुम्हें ही 
मानों जान लिया है 
तेरी ही छांव में हैं 
तेरा ही साया इसे मान लिया है  
धूप सुहानी हर आलम दिवाना लगे 
तेरी यादों से 
दिल को ठिकाना लगे 
तेरी छांव में 
हर मौसम सुहाना लगे  
गर्मी की दोपहर भी 
अब प्यारी लगे,  
तेरी यादों के साए में 
ये धूप भी न्यारी लगे। 

जब थक जाए दिल इन राहों में,  
तेरी मुस्कान जैसे बारिश की बूंद।  
हर दर्द को छूकर गुजर जाती है,  
तेरी यादें बन जाएं मीठा सा सुकून।
जब थक जाए दिल इन राहों में,  
तेरी मुस्कान जैसे बारिश की बूंद।  
हर दर्द को छूकर गुजर जाती है,  
तेरी यादें बन जाएं मीठा सा सुकून।


तेरी यादों से 
दिल को ठिकाना लगे 
तेरी छांव में 
हर मौसम सुहाना लगे  
गर्मी की दोपहर भी 
अब प्यारी लगे,  
तेरी यादों के साए में 
ये धूप भी न्यारी लगे।  

मंगलवार, 8 अप्रैल 2025

"शायद इस शायद पर"

हो ...हो... हा ..हा ..पन्ने 
पन्ने फड़फड़ाएं मेंढ़ों पर 
मेंढ़ों पर ....
मैं शायरी लिखूं .....
मैं शायरी लिखूं 
गद्दण पर भेड़ों पर 
अक्सर अक्षर ....अक्षर
उड़ें फिजाओं में ... 
फिजाओं में 
मैं तुम्हें महसूस करुं
महसूस करुं,
करुं, हवाओं में 
गुज़रे लम्हों का 
कहां वो नजारा मिले 
गुज़रे लम्हों का 
कहां वो नजारा मिले 
तुम दो चोटियां करके आओ 
और मैं वस्ता लेके तेरे पीछे चलूं 
तुम दो चोटियां करके आओ 
और मैं वस्ता लेके तेरे पीछे चलूं 
शायद इस शायद पर फूल दोबारा खिलें 
शायद इस शायद पर फूल दोबारा खिलें 
फूल दोबारा खिलें.....

ऊंचे पहाड़ से 
अपना गांव घर देखूं  
अपना गांव घर देखूं 
दूर बड़ी दूर .....
दूर, धुंधली सी 
तेरी झलक देखूं 
तेरी झलक देखूं 
बरसात हो 
झकरने गिरें फुहारें गिरे 
फुहारें गिरे...
उफान पर हो इश्क ए दरिया 
इश्क़ ए दरिया 
दोनो किनारे पागल निरे ....
दोनों पागल निरे
बीते जमाने उम्र बीती 
बीती उम्र 
आज भी लगते बही सिलसिले 
बही सिलसिले....
तुम बरसात में भीगती चलो 
और मैं तुम्हें गिरते गिरते बचा लूं 
तुम बरसात में भीगती चलो 
और मैं तुम्हें गिरते गिरते बचा लूं 
शायद इस शायद पर भूले दोबारा मिलें 
शायद इस शायद पर भूले दोबारा मिलें 
भूले दोबारा मिलें....

किनारे से गहरा पानी निहारुं 
किनारे से गहरा पानी निहारुं 
सदाओं में... 
सदाओं में तुम्हें पुकारुं 
हो...
सदाओं में तुम्हें पुकारुं 
हवाओं में तेरी चुनरी उड़ती आए 
हवाओं में तेरी चुनरी उड़ती आए 
तेरी चुनरी उड़ती आए 
झूम के बाहों में भर लूं 
....हो... झूम के बाहों में भर लूं
तू मुझसे मिलने आऐ 
जब तू मुझसे मिलने आए 
बेशक ए इश्क़ 
बेशक ए इश्क़ तू जालिम है 
तू जालिम है 
पर नहीं हैं तुमसे कोई गिले 
नहीं तुम से कोई गिले 
तुम आज से ...
तुम आज से ..तुम आज से थोड़ा पीछे चलो 
थोड़ा पीछे चलो 
और मैं जरा कल में जी लूं 
और मैं जरा कल में जी लूं 
कल में जी लूं 
शायद इस शायद पर हम दोबारा मिलें 
शायद इस शायद पर हम दोबारा मिलें 
हम दोबारा मिलें....

मंगलवार, 1 अप्रैल 2025

"...वो ...पागल"

भूख से त्रस्त पशु 
जैसे हरियाली देखता है 
ऐसे देखता रहा 
.वो ...पागल
डोलता हरा लिवास 
जैसे मैं तुम्हें देखता हूं


प्यास से बेहाल पंछी 
जैसे दरिया देखता है 
ऐसे देखता रहा 
...वो ...पागल 
झिलमिलाता दृश्य 
जैसे मैं तुम्हें देखता हूं 


विरह से व्यथित प्रेमी 
जैसे प्रेयसी देखता है 
ऐसे देखता रहा 
...वो... पागल 
उस शख्सियत को 
जैसे मैं तुम्हें देखता हूं 
 

                                      अजनबी 

गुरुवार, 27 मार्च 2025

"पनघट सुंदर लगता है"

जब सुबह दिन उगता है 
पनघट सुंदर लगता है 
कलरव करते पंछी 
कल-कल बहता पानी 
जब कोई घड़ा लेकर चलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
जब सुबह सूरज उगता है 
पनघट सुंदर लगता है 

जब सूरज आग उगलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
निर्मल शीतल 
जल की ओक प्यास बुझाती है 
थके हारों में ताजगी भर जाती है 
राहगीर फिर राह पर चलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
जब सूरज आग उगलता है 
पनघट सुंदर लगता है 

जब सांझ को दिन ढलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
झिंगुर रागिनी गाएं 
उड़ते जुगनू जगमगाएं 
प्रेम एहसास मचलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
जब सांझ को दिन ढलता है 
पनघट सुंदर लगता है 



"नल तो आज कल की सोगात हैं 
हमने तो कई सुबह शाम गुजारे हैं पनघट पर"

"ए इश्क़ गुजरो तो कभी उस पनघट से 
ये अजनबी बैठा मिलेगा बहीं पनघट पर"

                                            अजनबी 

बुधवार, 26 मार्च 2025

वो दिल कहां से लाएं

इक जद्दोजहद है जिंदगी 
तेरी चाहतों से थोड़ी आसान लगे 
उड़ता परिंदा हूं 
ओझल हो जाऊं 
दुनिया की नजरों से 
कितना हसीन 
ये आसमान लगे 
तू हमदर्द 
सर्द धुंध सा मेरे अगल-बगल 
तेरे सिवा कुछ न दिखे 
घुल गया है मेरे वजूद में 
खुशबू सा 
न महके ऐसा क्या आजमाएं 
तुम्हें सोच के न हर्षाए 
जो तुम्हें न चाहे 
वो दिल कहां से लाएं 

दुश्वारियों में गुजर-बसर है 
तेरी आहटों से 
सोहराते सामान लगे 
अजनबी हूं 
खो जाऊं अनजानी राहों में 
कितना बेगाना ये जहां लगे 
तू परछाई सायों सा 
मेरे इर्द-गिर्द 
तेरे ओज से 
उजालों में भी कुछ न दिखे 
ज़हन में बसा है जो 
अपना बन के गैर है वो 
कैसे खुद को समझाएं 
मुझे न सताए जो 
तुम्हें न चाहे 
वो दिल कहां से लाएं 

मूक सन्नाटे 
कभी जोरों का 
कोलाहल है यहां 
तेरी मुस्कराहटों से 
संगीतमय ये ज़हान लगे 
तू आसमानी परी सी 
छुपा ले अपने आगोश में 
ये दर्द अब अन सहा लगे 
धूप रोशनी हवाओं सी 
मेरे आस-पास 
महसूस हो पर न दिखे 
सपनों में आती है 
हकीकत में नहीं 
भ्रम है असल नहीं 
छलावे से कैसे खुद को बचाएं 
मुझे न फंसाए 
जो तुम्हें न चाहे 
वो दिल कहां से लाएं 

                                           अजनबी