रविवार, 16 नवंबर 2025

"वक्त मुकर्रर है "


💔  “वक़्त मुक़र्रर है”


ठहर जा मेरे साथ ही,
ढलती शाम तक,
पाबंद है बड़ा,
वक़्त अपने वक़्त का।
जो  वक़्त आ गया,
तो कौन तेरे लिए बेकरार होगा।
             
         🌿🌸 🌿

थोड़ी देर ही सही,
अपनी सूरत 
मेरी आँखों के पास तो रख,
बंद हो जाएँगी ये आँखें,
तो फिर कहाँ दीदार होगा।
            
          🌿🌸🌿

एक वो है,
जो पास आती जा रही है,
और एक तू है,
जो दूर चली जाती है।
तेरे आने से पहले वो आ गई तो,
फिर कहाँ हमसे तेरा इंतज़ार होगा।
            
          🌿🌸🌿

चलो मैं ही ग़लत सही,
जो ऊँचे आसमाँ को चाहने लगा,
पर देखो, वक़्त भी मुक़र्रर है,
आएगा तो लेकर ही जाएगा,
फिर कहाँ इस जन्म में तुमसे प्यार होगा। 
           
           🌿🌸🌿
                                               
                                                अजनबी 


शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2025

"वाह रे करवा"

तन-मन की साधना से पहले,
धो दिए सब उसने,
मेरे भावों के छींटे —
जो उसकी रूह पर लगे थे।

अब वह निश्चल है,
जैसे आरती का ठहरा जल,
निर्मल है —
जैसे गंगा में विलीन हो गया हो सब कुछ।

अब उसकी स्मृति-पटल पर
नहीं कोई मेरा ख्याल,
बुद्धमयी शांति ठहरी है वहाँ —
जहाँ मेरे भाव विचरते थे।

वाह रे करवा,
विरही को त्याग,
शांत बुद्ध में विलीन हो गया रे तू।

अब प्रेम नहीं,
समाधि बन गया —
मन झर गया,
बस शून्य रह गया रे मैं।

                                    
                                             अजनबी 

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रविवार, 5 अक्टूबर 2025

कितना खूबसूरत चांद

कौन से आसमां से उतर आया,
या मेरी चाहत से खिंचा आया।

धुंधले उजाले में टकटकी लगाए,
देखता मुझे, मैं उसे...
चुप्पियों में गुफ़्तगू सा साया।

देखो तो कितना ख़ूबसूरत चांद
अटका है मेरी दीवार पर,
झूम उठता है यह दिल
उसमें देख तेरी छाया। 

                                         अजनबी 

सोमवार, 1 सितंबर 2025

हे गिरधर.....

हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा।

पर्वत बन गए गारा,
धँस रही गीली धरा,
क्या करे हिमालय बेचारा।
हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा।


दुनिया डोले संकट भारी,
नदियाँ उफनें, डूबी धरती सारी,
मेघों ने फैलाया अंधियारा।
हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा।

भटके मन को राह दिखा दे,
डूबती नैया पार लगा दे,
तेरा ही है नाम सहारा।
हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा। 


                                          अजनबी 



शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

"सहूलियत"

कुछ तो सहूलियत
दी है सरकार ने,
चौबीसों घंटे
मिलते हैं दरबार में।

एक हल्का-सा स्पर्श,
और रूबरू हो जाते हैं,
शुक्र है, ब्रह्म मुहूर्त में
हम उन्हें देख पाते हैं। 

                     अजनबी 

रविवार, 17 अगस्त 2025

तुझे ही देखता हूं

कल से कुछ नहीं देखता हूं, सिर्फ़ तुझे देखता हूं
तेरी आँख में जैसे अपना जहाँ देखता हूं


तेरी ख़ामुशी दिल में गूँज उठे सदा बनकर
उस सदा में मैं कोई कारवाँ देखता हूं


चाँदनी में तेरा ही चेहरा झलक उठे अक्सर
रात की गोद में तेरा आसमां देखता हूं


तेरी सूरत के साए हर मोड़ पे मिल ही जाते
उन सायों में तेरा इक निशां देखता हूं


लोग कहते हैं अजनबी इश्क़ में हुआ है अंधा
हाँ मैं अंधा बस तुझे ही देखता हूं 


                                              अजनबी 

सोमवार, 11 अगस्त 2025

"मैं इक खुफिया कलाकार "

दिल के मौसम लिखता रहा,
पर किसी ने न जाना, मेरा संसार।
जिसे पहचान ना पाए यार 
ओ.....मैं इक खुफिया कलाकार


भीड़ में तन्हा, मैं चलता रहा,
लफ़्ज़ों में अपना दिल रखता रहा,
ज़माने को बस शोर था प्यारा,
मैं चुपचाप अपना गीत गाता रहा। 
सुर्खियों में नहीं निकला मैं गीतकार 
जिसमें जज्बात बेशुमार 
ओ.... मैं इक खुफिया कलाकार

मेरी ग़ज़लों में हैं रंग हज़ार,
मेरी कविताएं उसके दिल के द्वार,
पर सबको थी बस जल्दी की हवा,
किसे फुर्सत थी बैठ कर सुने ज़रा। 
अजीज महफिलों से रहा दरकिनार 
जिसके दिल द्वार लफ्ज़ बेशुमार 
...... मैं खुफिया कलाकार 

लोगों की नज़रें, आगे-आगे,
दिल की किताबें, पीछे रह जाएँ,
मैंने जो कहा, वो सुन न सके,
जो महसूस हुआ, वो समझ न सके।
ये जितने बेपरवाह मैं उतना वफ़ादार 
जज्बों का सौदागर ख्वाबों का सरदार 
ओ...... मैं इक खुफिया कलाकार

एक दिन शायद, हवा बदलेगी,
किसी की नज़र मेरी कलम पढ़ लेगी,
फिर मेरा नाम, आसमान छू लेगा,
और मेरा गीत, सबके दिल में गूंजेगा 

रातों में लिखूँ, सुबहों में गाऊँ,
अपनी रूह का राज़, शब्दों में समाऊँ। 
दिल मैं संभाले जज्बात हजार 
तब तक मैं .....खुफिया कलाकार 

                                     अजनबी