मंगलवार, 8 अप्रैल 2025

"शायद इस शायद पर"

हो ...हो... हा ..हा ..पन्ने 
पन्ने फड़फड़ाएं मेंढ़ों पर 
मेंढ़ों पर ....
मैं शायरी लिखूं .....
मैं शायरी लिखूं 
गद्दण पर भेड़ों पर 
अक्सर अक्षर ....अक्षर
उड़ें फिजाओं में ... 
फिजाओं में 
मैं तुम्हें महसूस करुं
महसूस करुं,
करुं, हवाओं में 
गुज़रे लम्हों का 
कहां वो नजारा मिले 
गुज़रे लम्हों का 
कहां वो नजारा मिले 
तुम दो चोटियां करके आओ 
और मैं वस्ता लेके तेरे पीछे चलूं 
तुम दो चोटियां करके आओ 
और मैं वस्ता लेके तेरे पीछे चलूं 
शायद इस शायद पर फूल दोबारा खिलें 
शायद इस शायद पर फूल दोबारा खिलें 
फूल दोबारा खिलें.....

ऊंचे पहाड़ से 
अपना गांव घर देखूं  
अपना गांव घर देखूं 
दूर बड़ी दूर .....
दूर, धुंधली सी 
तेरी झलक देखूं 
तेरी झलक देखूं 
बरसात हो 
झकरने गिरें फुहारें गिरे 
फुहारें गिरे...
उफान पर हो इश्क ए दरिया 
इश्क़ ए दरिया 
दोनो किनारे पागल निरे ....
दोनों पागल निरे
बीते जमाने उम्र बीती 
बीती उम्र 
आज भी लगते बही सिलसिले 
बही सिलसिले....
तुम बरसात में भीगती चलो 
और मैं तुम्हें गिरते गिरते बचा लूं 
तुम बरसात में भीगती चलो 
और मैं तुम्हें गिरते गिरते बचा लूं 
शायद इस शायद पर भूले दोबारा मिलें 
शायद इस शायद पर भूले दोबारा मिलें 
भूले दोबारा मिलें....

किनारे से गहरा पानी निहारुं 
किनारे से गहरा पानी निहारुं 
सदाओं में... 
सदाओं में तुम्हें पुकारुं 
हो...
सदाओं में तुम्हें पुकारुं 
हवाओं में तेरी चुनरी उड़ती आए 
हवाओं में तेरी चुनरी उड़ती आए 
तेरी चुनरी उड़ती आए 
झूम के बाहों में भर लूं 
....हो... झूम के बाहों में भर लूं
तू मुझसे मिलने आऐ 
जब तू मुझसे मिलने आए 
बेशक ए इश्क़ 
बेशक ए इश्क़ तू जालिम है 
तू जालिम है 
पर नहीं हैं तुमसे कोई गिले 
नहीं तुम से कोई गिले 
तुम आज से ...
तुम आज से ..तुम आज से थोड़ा पीछे चलो 
थोड़ा पीछे चलो 
और मैं जरा कल में जी लूं 
और मैं जरा कल में जी लूं 
कल में जी लूं 
शायद इस शायद पर हम दोबारा मिलें 
शायद इस शायद पर हम दोबारा मिलें 
हम दोबारा मिलें....

मंगलवार, 1 अप्रैल 2025

"...वो ...पागल"

भूख से त्रस्त पशु 
जैसे हरियाली देखता है 
ऐसे देखता रहा 
.वो ...पागल
डोलता हरा लिवास 
जैसे मैं तुम्हें देखता हूं


प्यास से बेहाल पंछी 
जैसे दरिया देखता है 
ऐसे देखता रहा 
...वो ...पागल 
झिलमिलाता दृश्य 
जैसे मैं तुम्हें देखता हूं 


विरह से व्यथित प्रेमी 
जैसे प्रेयसी देखता है 
ऐसे देखता रहा 
...वो... पागल 
उस शख्सियत को 
जैसे मैं तुम्हें देखता हूं 
 

                                      अजनबी 

गुरुवार, 27 मार्च 2025

"पनघट सुंदर लगता है"

जब सुबह दिन उगता है 
पनघट सुंदर लगता है 
कलरव करते पंछी 
कल-कल बहता पानी 
जब कोई घड़ा लेकर चलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
जब सुबह सूरज उगता है 
पनघट सुंदर लगता है 

जब सूरज आग उगलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
निर्मल शीतल 
जल की ओक प्यास बुझाती है 
थके हारों में ताजगी भर जाती है 
राहगीर फिर राह पर चलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
जब सूरज आग उगलता है 
पनघट सुंदर लगता है 

जब सांझ को दिन ढलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
झिंगुर रागिनी गाएं 
उड़ते जुगनू जगमगाएं 
प्रेम एहसास मचलता है 
पनघट सुंदर लगता है 
जब सांझ को दिन ढलता है 
पनघट सुंदर लगता है 



"नल तो आज कल की सोगात हैं 
हमने तो कई सुबह शाम गुजारे हैं पनघट पर"

"ए इश्क़ गुजरो तो कभी उस पनघट से 
ये अजनबी बैठा मिलेगा बहीं पनघट पर"

                                            अजनबी 

बुधवार, 26 मार्च 2025

वो दिल कहां से लाएं

इक जद्दोजहद है जिंदगी 
तेरी चाहतों से थोड़ी आसान लगे 
उड़ता परिंदा हूं 
ओझल हो जाऊं 
दुनिया की नजरों से 
कितना हसीन 
ये आसमान लगे 
तू हमदर्द 
सर्द धुंध सा मेरे अगल-बगल 
तेरे सिवा कुछ न दिखे 
घुल गया है मेरे वजूद में 
खुशबू सा 
न महके ऐसा क्या आजमाएं 
तुम्हें सोच के न हर्षाए 
जो तुम्हें न चाहे 
वो दिल कहां से लाएं 

दुश्वारियों में गुजर-बसर है 
तेरी आहटों से 
सोहराते सामान लगे 
अजनबी हूं 
खो जाऊं अनजानी राहों में 
कितना बेगाना ये जहां लगे 
तू परछाई सायों सा 
मेरे इर्द-गिर्द 
तेरे ओज से 
उजालों में भी कुछ न दिखे 
ज़हन में बसा है जो 
अपना बन के गैर है वो 
कैसे खुद को समझाएं 
मुझे न सताए जो 
तुम्हें न चाहे 
वो दिल कहां से लाएं 

मूक सन्नाटे 
कभी जोरों का 
कोलाहल है यहां 
तेरी मुस्कराहटों से 
संगीतमय ये ज़हान लगे 
तू आसमानी परी सी 
छुपा ले अपने आगोश में 
ये दर्द अब अन सहा लगे 
धूप रोशनी हवाओं सी 
मेरे आस-पास 
महसूस हो पर न दिखे 
सपनों में आती है 
हकीकत में नहीं 
भ्रम है असल नहीं 
छलावे से कैसे खुद को बचाएं 
मुझे न फंसाए 
जो तुम्हें न चाहे 
वो दिल कहां से लाएं 

                                           अजनबी 

सोमवार, 3 मार्च 2025

मेरे घर आंगन बसंत आया.....

देखो वो कोंपलों 
लदी टहनियां....... 🌿☘️🍀🌾
मानों प्रकृति ने 
नन्हें-नन्हें फूलों 
से बाग़ अपना 
अनंत सजाया 
मेरे घर आंगन वसंत आया 
🥀🌹🌼🌻🏵️🌸🌺🌷
देखो वो
हंसता सूरज....... ☀️🌤️⛅🌥️☀️🌤️
मानो अलौकिक 
किरणों की 
गर्माहट लेकर 
नील गगन से 
कोई तंत आया 
मेरे घर आंगन बसंत आया
🍀☘️🌷🌺🌹🥀🌼🌸
देखो वो 
सफेद फूल....... 🌸🌻🌼🏵️🌸🏵️🌻🌼
मानों ईश्वरीय
मुस्कान लेकर 
कोई संत आया 
मेरे घर आंगन बसंत आया 
🏵️🌸🌻🌹🌺🌷🌿🌾

                                                                   ✍️...अजनबी