नक्शे कदम पर चला
सारे के सारे वो दोस्त
मतलबी निकले
दरबदर भटका
बिना सींग की भेड़ भी
वो हिंसक निकली
ब्रह्म मुहूर्त में
ध्याया जिसको
वो मूरत भी
पत्थर की निकली
कट्टरता पर अड़ी रही
वो तरुणाई की पहली
पसंद भी मजहबी निकली
होली के मौके पर बेरंग हूं
खुद ही पोत ले खुद को
अजनबी दिल से
यह आवाज निकली
अजनबी
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