सोमवार, 1 सितंबर 2025

हे गिरधर.....

हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा।

पर्वत बन गए गारा,
धँस रही गीली धरा,
क्या करे हिमालय बेचारा।
हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा।


दुनिया डोले संकट भारी,
नदियाँ उफनें, डूबी धरती सारी,
मेघों ने फैलाया अंधियारा।
हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा।

भटके मन को राह दिखा दे,
डूबती नैया पार लगा दे,
तेरा ही है नाम सहारा।
हे गिरधर...
उठा ले फिर गोवर्धन,
दे हम सबको सहारा। 


                                          अजनबी 



शुक्रवार, 29 अगस्त 2025

"सहूलियत"

कुछ तो सहूलियत
दी है सरकार ने,
चौबीसों घंटे
मिलते हैं दरबार में।

एक हल्का-सा स्पर्श,
और रूबरू हो जाते हैं,
शुक्र है, ब्रह्म मुहूर्त में
हम उन्हें देख पाते हैं। 

                     अजनबी 

रविवार, 17 अगस्त 2025

तुझे ही देखता हूं

कल से कुछ नहीं देखता हूं, सिर्फ़ तुझे देखता हूं
तेरी आँख में जैसे अपना जहाँ देखता हूं


तेरी ख़ामुशी दिल में गूँज उठे सदा बनकर
उस सदा में मैं कोई कारवाँ देखता हूं


चाँदनी में तेरा ही चेहरा झलक उठे अक्सर
रात की गोद में तेरा आसमां देखता हूं


तेरी सूरत के साए हर मोड़ पे मिल ही जाते
उन सायों में तेरा इक निशां देखता हूं


लोग कहते हैं अजनबी इश्क़ में हुआ है अंधा
हाँ मैं अंधा बस तुझे ही देखता हूं 


                                              अजनबी 

सोमवार, 11 अगस्त 2025

"मैं इक खुफिया कलाकार "

दिल के मौसम लिखता रहा,
पर किसी ने न जाना, मेरा संसार।
जिसे पहचान ना पाए यार 
ओ.....मैं इक खुफिया कलाकार


भीड़ में तन्हा, मैं चलता रहा,
लफ़्ज़ों में अपना दिल रखता रहा,
ज़माने को बस शोर था प्यारा,
मैं चुपचाप अपना गीत गाता रहा। 
सुर्खियों में नहीं निकला मैं गीतकार 
जिसमें जज्बात बेशुमार 
ओ.... मैं इक खुफिया कलाकार

मेरी ग़ज़लों में हैं रंग हज़ार,
मेरी कविताएं उसके दिल के द्वार,
पर सबको थी बस जल्दी की हवा,
किसे फुर्सत थी बैठ कर सुने ज़रा। 
अजीज महफिलों से रहा दरकिनार 
जिसके दिल द्वार लफ्ज़ बेशुमार 
...... मैं खुफिया कलाकार 

लोगों की नज़रें, आगे-आगे,
दिल की किताबें, पीछे रह जाएँ,
मैंने जो कहा, वो सुन न सके,
जो महसूस हुआ, वो समझ न सके।
ये जितने बेपरवाह मैं उतना वफ़ादार 
जज्बों का सौदागर ख्वाबों का सरदार 
ओ...... मैं इक खुफिया कलाकार

एक दिन शायद, हवा बदलेगी,
किसी की नज़र मेरी कलम पढ़ लेगी,
फिर मेरा नाम, आसमान छू लेगा,
और मेरा गीत, सबके दिल में गूंजेगा 

रातों में लिखूँ, सुबहों में गाऊँ,
अपनी रूह का राज़, शब्दों में समाऊँ। 
दिल मैं संभाले जज्बात हजार 
तब तक मैं .....खुफिया कलाकार 

                                     अजनबी 


मंगलवार, 29 जुलाई 2025

इश्क ए शराब


सन्नाटा था दिल में गहरा
उसकी आहट ने जैसे छू लिया सवेरा 


उसकी आहट से मेरी 
तो दुनियां निखर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई  

इश्क ए शराब के आगे 
नशा ए शराब कुछ नहीं 
एक उतरा एक चढ़ गया 
इसमें मेरा लगा कुछ नहीं 
मुस्कान जैसे बिजुरिया 
घटाएं चांद पर आकर बिखर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई  

रोशन हुए मेरे 
दरों-दीवार उसके आने से  
फिर बेकरार हुआ 
ये दिल उसके जाने से 
अंधेरे में जुगनू की महफिलें 
पल भर में न जाने किधर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई  


दिल की तासीर को 
आखिर महकदा याद आया  
मैंने देखा, उसने देखा मुझे, 
हाले दिल सारा साकी को सुनाया 
जाते-जाते उसकी 
खामोशी में इक बात रह गई
उसकी आहट से मेरी 
तो दुनियां निखर गई
जब देखा उसे, जितनी 
पी थी सारी उतर गई 

                               अजनबी 

रविवार, 27 जुलाई 2025

"अरमान बहीं"

चलते रहे हम वक़्त की राहों में
तेरे मेरे हिस्से थे कुछ गवाहों में
तू हँसा कहीं, मैं रोया कहीं
फिर भी दिल कहता रहा तू यहीं
शरीर बूढ़े होते हैं, चाहत नहीं
हम भी वहीं, तुम भी वहीं
वक्त बदल गया
मगर अरमान बहीं…"

तस्वीरों में अब भी वही रंग हैं
साँसों में तेरे नाम के संग हैं
तू जो नज़रों से ओझल सही
पर दिल के आईने में तू ही तू रही
"शरीर बूढ़े होते हैं, चाहत नहीं
हम भी वहीं, तुम भी वहीं
वक्त बदल गया
मगर अरमान बहीं…"

कभी चिट्ठियों में, कभी ख़्वाबों में
तेरे बिना अधूरे हर जवाबों में
आज भी धड़कन कहती यही
"वो मोहब्बत अब भी है सही…"
"शरीर बूढ़े होते हैं, चाहत नहीं
हम भी वहीं, तुम भी वहीं
वक्त बदल गया
मगर अरमान बहीं… 

                                                   अजनबी 



शुक्रवार, 18 जुलाई 2025

" रंग भर रहा हूं "

रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं 

फीके पड़ गये जो लफ्ज़ 
तेरे मेरे नाम दर्ज 
उनमें उमंग भर रहा हूं 
हुई न कभी जो बातचीत 
तेरे मेरे बीच 
कुछ अनकहे प्रसंग भर रहा हूं 
रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं   

जमीन से बंधी डोर है 
हुनर वाज परिंदे चारों ओर है 
आसमान पाने की चाह में 
इन हवाओं से जंग लड़ रहा हूं
ख्वाबों के आसमान में
तेरी तलाश में 
कच्ची डोर से बंधा
मैं पतंग बन रहा हूं 
रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं 

दूरियों के जो दरमियां 
तेरी मेरी हैं खामोशियां 
उनमें मीठी तरंग भर रहा हूं 
रह गई तेरी बाहों की 
गुल्फों से जो कुछ नज़ाकतें 
रह गई तेरी जुल्फों से 
जो कुछ शरारतें 
उस मस्ती में भंग भर रहा हूं
रंग भर रहा हूं 
तेरे संग भर रहा हूं 

                                           अजनबी